आजकल बड़े-बड़े पुल और फ्लाईओवर बहुत तेजी से बनाए जा रहे हैं। इन पुलों को बनाने में एक खास मशीन का इस्तेमाल होता है, जिसे Launching girder कहते हैं। यह एक बहुत बड़ी और मजबूत स्टील की मशीन है जो खुद चल सकती है। इसका मुख्य काम है – पहले से तैयार किए गए कंक्रीट के लंबे बीम (गर्डर) को सही जगह पर बैठाना।

यह काम कैसे करता है?
- सबसे पहले फैक्ट्री में बड़े-बड़े कंक्रीट के गर्डर बनाए जाते हैं।
- इन गर्डरों को ट्रक से निर्माण स्थल पर लाया जाता है।
- लॉन्चिंग गर्डर को पुल के एक छोर पर खड़ा कर दिया जाता है।
- फिर यह मशीन अपने हाइड्रोलिक जैक और वायर रोप की मदद से गर्डर को ऊपर उठाती है।
- उसके बाद मशीन खुद आगे बढ़ती है और गर्डर को ठीक जगह पर रख देती है।
- एक गर्डर रखने के बाद मशीन आगे बढ़कर अगला गर्डर लाती है।
इस पूरी प्रक्रिया को ”Launching ” कहते हैं, इसलिए मशीन का नाम भी लॉन्चिंग गर्डर पड़ा।
कहाँ-कहाँ इस्तेमाल होता है?
- रेलवे के बड़े पुलों में
- हाईवे और एक्सप्रेसवे के फ्लाईओवर में
- मेट्रो रेल के एलिवेटेड ट्रैक में
- नदियों पर बनने वाले लंबे पुलों में
भारत में दिल्ली मेट्रो, मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक, अटल सेतु (मुंबई) और कई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में लॉन्चिंग गर्डर का बहुत इस्तेमाल हो रहा है।
इसके फायदे
- पुरानी तरीके से Scaffolding (बांस या लकड़ी का ढांचा) लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।
- काम बहुत तेज होता है – एक-एक स्पैन (खंड) सिर्फ 3-4 दिन में तैयार हो जाता है।
- नदी या गहरी घाटी में काम करना आसान हो जाता है।
- मजदूरों की सुरक्षा बढ़ जाती है।
- लागत भी कम आती है।
कुछ जरूरी बातें
launching girder 100 से 300 ton तक वजन उठा सकती है। यह 40 से 60 मीटर लंबे गर्डर को आसानी से रख सकती है। आजकल कंप्यूटर कंट्रोल वाली आधुनिक launching girder भी आ गई हैं, जो और ज्यादा सुरक्षित और तेज हैं।
निष्कर्ष
launching girder ने भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को नई रफ्तार दी है। अब पुल बनाना पहले से कहीं आसान, तेज और सुरक्षित हो गया है। अगर आप सिविल इंजीनियरिंग के छात्र हैं या निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं, तो लॉन्चिंग गर्डर की तकनीक समझना आपके लिए बहुत फायदेमंद होगा।